कुआँ खोदूँगा रोज अपने जीविका पाने के चक्कर में

चुना है मैंने कूड़ा करकट

खाया है बेचकर वो सब
तुमनें हर पल में दिया है
मुझे गरीबी।।।

क्या सोचे थे??
कि मैं टूट जाऊँगा
पर ये नहीं होगा मुझसे।।

मैं टूट कैसे जाऊँगा
अपना बचपना, अपना बचपन कैसे भूल जाऊँगा

हाँ!!!
ये तय है कि कुआँ खोदूँगा रोज
अपने जीविका पाने के चक्कर में।।
पर,,
अपना बचपना, अपना बचपन कैसे भूल जाऊँगा।।

है अगर तुम में ये हिम्मत
तो छीन कर दिखा दे
मेरा बचपना, मेरा बचपन
और चेहरे पर की ये निश्छल हँसी।

रचना- विष्णु सिंह

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