फादर्स डे: रिश्ता वही लेकिन सोच नई

दुनिया चाहे डिजिटल मीडिया का हो या गांव शहर का, वर्षो से जो रिश्ते चले आ रहे है उसकी मजबूती आज भी उतनी ही है। भले ही इंटरनेट के युग में फादर्स डे मनाने का ट्रेंड थोड़ा अलग हो गया हो लेकिन पिता का अपने बच्चों के साथ आज भी वही भावनात्मक लगाव जुड़ा हुआ है जो 100 वर्ष पहले हुआ करता था। एक पिता जो अपने बच्चों के आइडियल होते है,उनका भरोसा होते है पापा है तो मैं सुरक्षित हूँ, उन्हें लगता है उनके पापा सुपरमैन है जो दुनिया की हर चीज उन्हें लाकर दे सकते है ये बाते सच भी है एक पिता का वश चले तो वो दुनिया की हर खुशी अपने बच्चों की झोली में डाल दें।
यूँ तो पिता की तारीफ में जितने भी शब्द लिखूं वो सब फीके पड़ जाएंगे उनकी तारीफ के लिए लेकिन फिर भी कभी-कभी शब्दों को जाहिर करना भी जरूरी होता है।

बदलते जमाने के साथ माँ और बेटे का रिश्ता, पिता बेटी के रिश्ते में खुलापन आया है जो बदलते भारत की अलग ही तस्वीर बयां करती है। वो दौर और था जब बेटियां मायके की दहलीज लांघकर डोली में बैठते समय पिता के सीने से लगकर रोया करती थी। आज की बेटियां बॉयफ्रेंड के डिच करने के बाद अपने मां के वजाय पापा का सहारा लेती है। पापा अपनी परी को यह कहते हुए चुप कराते है कि वो खुद से भी अच्छा इंसान ढूंढ निकालेंगे क्योंकि एक बेटी के लिए उसका पिता दुनिया का बेस्ट इंसान होता है।

कुछ दिन पहले सुपरस्टार आमिर खान ने अपनी बेटी के साथ सोशल साइट्स पर एक फोटो शेयर किया था जिसमें उनकी बेटी उनके साथ गोद मे बैठकर खेलती हुई नजर आ रही थी ये बातें कुछ लोगों को हजम नहीं हुआ क्योंकि उनका हाजमा खराब हो चुका है और उन्हें ट्रोल करना शुरू कर दिया और उल्टे-सीधे ढेर सारे गंदे कमेंट भी लिख दिया। मैं ये वाक़या किसी को जस्टिफाई करने के लिए नहीं लिख रही हूं किसने सही किया और किसने गलत बल्कि इसलिए लिख रही हूं कोई भी माँ अपने बेटे के साथ खेलते हुए, पुचकारते हुए, दुलार करते हुए या कोई पिता अपनी बेटी के साथ ऐसी तसवीरें पोस्ट करता है तो इसमें गलत क्या है?

आज रिश्तों की परिपाटी बदल रही है बदलते वक्त के साथ पिता भी खुद को बच्चों के रंग में रंगने की पूरी कोशिश करते है। वो अपनी बेटी के राजदार के साथ रायदार भी बन रहे है। बात पीरियड्स को लेकर करनी हो या लिव इन रिलेशनशिप को लेकर वो बात करने में बिल्कुल नहीं कतराती है एक अच्छे दोस्त की तरह अपने पापा को इसमें शामिल करती है ।

नीलेश मिश्रा जो एक बड़े बिजनेस मैन है उनकी इकलौती बेटी आज बड़े से कंपनी में सॉफ्टवेयर इंजीनियर बन गयी है वो अपनी बेटी के इस कामयाबी से बहुत खुश है लेकिन साथ ही एक डर यह आया जब उनकी बेटी ने अपने बॉयफ्रेंड के साथ लिव इन रिलेशनशिप में रहने के लिए इजाजत मांग लिया, पिता ने भी सोच विचार समाज और दुनिया की परवाह किये बिना इसकी इजाजत दे दिया। मुझे नहीं पता की नीलेश का फैसला सही है या गलत लेकिन इतना जरूर पता है कि जो विश्वास और अनुशासन उन्होंने अपनी बेटी को सिखाया उसमें वो खड़ी उतरी और अपने फैसले में अपने पिता को भी शामिल किया।

बदलते युग के साथ पापा की तस्वीर भी बदल चुकी है वे खुलापन के साथ बच्चों के साथ जीना चाहते है। पापा का काम अब सिर्फ ऑफिस तक ही सीमित नहीं रह गया है बल्कि अपनी बेटी के नजर में सुपरमैन बनना भी है।
अपनी बेटी के जीवन में एक पिता का प्रभाव उसके सम्मान, पिता की छवि पुरुषों के प्रति उसकी सोच को निर्धारित करता है और जीवन जीने में सहायक भी होता है इसलिए बदलते वक्त के साथ पिता माँ-बाप दोनों की भूमिका में नजर आ रहें है।

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